Saturday, August 5, 2017

जनता तुम संघर्ष करो, हम तो चले अमेरिका!




जनता तुम संघर्ष करो, हम तो चले अमेरिका

रघुरामराजन का रिजर्व बैंक एक कार्यकाल के बाद छोड़ना और अब अरविन्द पनगढिया का एनआईटीआई आयोग से इस्तीफ़ा देकर अमेरिका स्थित अपना अपने पुराने विश्वविद्यालयों में वापस अध्यापन के लिए लौट जाना, दोनों घटनाएं मेरी नज़र में एक हैं। दोनों मुक्त बाज़ारवाद के समर्थक हैं। रघुरामराजन जब रिजर्व बैंक के गवर्नर नियुक्त किए गए तो उनकी किताब फ़ॉल्ट लाइन्स बड़ी मक़बूल हो गई। साथ में एक कहानी भी पॉपुलर हुई कि सबप्राईम संकट को उन्होंने कई साल पहले भविष्य में देख लिया था और कर्णधारों को सचेत भी कर दिया था। उनकी नियुक्ति पर एक आशा जगी कि शायद कभी उन्होंने भारत की भी आर्थिक जन्मपत्री पढ़ ली होगी और कुछ होगा उनके दिमाग़ में कि कैसे अर्थव्यवस्था को दिशा देनी होगी। ले दे कर रिजर्व बैंक के पास एक ही औज़ार था ब्याज़ दर। भारत के उद्योगपति और वित्त मन्त्रालय तरसता रह गया कि ब्याज दर में कटौती हो तो उद्योगों को फिर से धड़ाधड़ क़र्ज़ मिलना शुरू हो। (छोटे लोगों को तो वैसे ही लोन हमेशा महँगे दर पर ही मिलते रहे हैं, मिलते रहेंगे) ख़ैर हम देखते रहे और रघुरामराजन साहब रिजर्व बैंक को त्याग कर चलते बने। आख़िर में जाते जाते एनपीए की पिटारा बस खोल गए, करना क्या है किसी को नहीं मालूम।

जगदीश भगवती के साथ मिलकर अरविन्द पनगढ़िया ने अमर्त्य सेन की अर्थव्यवस्था की अवधारणा को लम्बे समय से चैलेंज करते रहे हैं। मौजूदा सरकार से अरविन्द पनगढ़िया की बनती भी बहुत रही है। पनगढ़िया के एनआईटीआई आयोग में आने के बाद आशा जगी कि एक वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की नींव पड़ेगी। वामपंथी नामकरण वाले योजना आयोग का नाम भी बदल दिया गया। पिछले सत्तर सालों को कोसते कोसते जाने क्या क्या उधाड़ डाले। जब नए बखिया चलाने का समय आया तो चल दिए। 

रघुरामराजन और अरविन्द पनगढ़िया विश्व स्तर पर जाने माने प्रोफ़ेसर और अर्थशास्त्री हैं। वापस जाकर फिर से अर्थव्यवस्था के सिद्धान्त पढ़ाने लगेंगे।

मेरे मन में एक प्रश्न उठ रहा है कि जब ये वहाँ पढ़ा रहे होंगे और कोई छात्र इनसे पूछेगा कि आप भारत की अर्थव्यवस्था संभाल-सुधार सके और यहाँ अपना ज्ञान बघार रहे हैं तो ये क्या जवाब देंगे। आँखें नीची रख कर क्या कहेंगे कि भारत में राजनीति गंदी है वहाँ सुधार सम्भव नहीं है? या वहाँ से भी अपनी इज़्ज़त सम्हाल कर इस्तीफ़ा देकर चल देंगे? इन्हें कहीं तो जवाब देना पड़ेगा। 

मैं तब बत्तीस साल की नौकरी के बाद पीएचडी के लिए प्रवेश परीक्षा पास कर इंटरव्यू के लिए गया तो मुझसे पूछा गया था कि आप तो फ़ील्ड से हैं, पीएचडी तो एकडेमिशियन का काम है आप यहाँ क्या करेंगे। मैंने तब कहा था कि आप प्रैक्टिकल को थियरी से अलग नहीं कर सकते। प्रैक्टिकल के परिणाम से नए सिद्धांतों का निर्माण होता है और थियरी को अमल में लाने के लिए उसे प्रैक्टिकल में उतारा जाता है। रघुरामराजन और अरविन्द पनगढ़िया अपनी थियरी को प्रैक्टिकल में उतार पाए। ऐसी थियरी हमारे किस काम की। 

अंत मेंराजनीति में एक नारा काफ़ी प्रचलन में रहा है, ‘……तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं बरसों पहले एक दल के मशहूर नेता ने एक अख़बार में एक लेख लिख कर कहा कि राजनीति गंदी होती है इसीलिए उन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया। मैंने उस लेख पर विरोध स्वरूप सम्पादक के नाम पत्र लिखते हुए पूछा कि अगर राजनीति गंदी है तो इसकी सफ़ाई कौन करेगा? देश के नौजवान, ग़रीब, कमज़ोर तबके के लोग किसकी ओर देखेंगे। राजनीति का कोई विकल्प नहीं है। साफ़ है कि रघुरामराजन और अरविन्द पनगढ़िया अपनी थियरी के साथ राजनीति का मुक़ाबला नहीं कर पाए। 

  
रघुरामराजन और अरविन्द पनगढ़िया का अमेरिका वापस जाना इस बात का संकेत है कि इन दोनों के पास भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कोई समाधान था और है। अगर होता तो त्यापत्र के बाद भी यहीं रुक कर बहस चलाते और राजनीति को मजबूर करते सही राह पर चलने के लिए। लेकिन इन दोनों को तो अपनी नौकरी प्यारी है। 

भारत की अर्थव्यवस्था अगर चलती जा रही है तो किसी अर्थशास्त्री की वजह से नहीं बल्कि आम आदमी या किसानों की अपनी उद्मशीलता की वजह से। जनता के लिए तो एक ही नारा है,  “जनता तुम संघर्ष करो हम तो चले अमेरिका

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