मैं तब होश ही संभाल रहा था। तब दर्जा पाँच या छ: में पढ़ता था जब अंग्रेज़ी हटाओ आंदोलन चल रहा था और उसी समय दक्षिण में इसके विरोध में आंदोलन चल रहा था। भारत कैसा बँटा है तब मालूम हुआ था इस आश्चर्य के साथ कि क्या हिंदी के अलावा भी अन्य भाषाएँ हिंदुस्तान में बोली जाती हैं और वे हिंदी के विरोध में हैं। बात आयी गयी हो गयी। मुझे अंग्रेज़ी समझ में नहीं आती थी। जब काशी हिंदू विश्व विद्यालय में पढने गया तो पाया मैं पिछड़ जाऊँगा अंग्रेज़ी न जानने की वजह से। मैं बड़े यत्न से अंग्रेज़ी सीखा लेकिन अंग्रेज़ी से घृणा करने लगा। अंग्रेज़ी मुझ जैसे लोगों को रास्ते से हटाने के लिए इस्तेमाल की जाती है, मेरा विश्वास पक्का हुआ। फिर जब साथ के सभी दोस्त विदेशी भाषाएँ सीखने में लगे थे, हम दो दोस्त उर्दू सीखने गए देखें कि हिंदी-उर्दू में क्या भेद-मतभेद है। लगा हिंदी उर्दू में तो कोई फ़र्क़ नहीं। फिर हम तमिल सीखने गए कि क्या अंतर है हिंदी तमिल में। हमारे अध्यापक ने पहले दिन बताया कि हिंदी और तमिल में कोई अंतर नहीं है। सचमुच में नहीं था। तब से अंग्रेज़ी की और ज़रूरत नहीं महसूस नहीं हुई। बच्चों को सफलता पूर्वक हिंदी माध्यम में पढ़ाया। मैंने ख़ुद बांगला और कन्नड सीखा। संस्कृत कभी भी हिंदुस्तान में सम्पर्क भाषा नहीं रही। एक दक्षिण भाषा भाषी से यह अपेक्षा कि वह टूटी फूटी ही सही हिंदी बोले लेकिन हिंदी भाषी तमिल शब्द का भी सही उच्चारण न कर सके। हिंदी भाषाभाषियों ने भाषायी एकता के पीठ में छुरा भोंका। तब समझ में आया कि दक्षिण भारत के लोग क्यों हिंदी का विरोध करते हैं और अंग्रेज़ी का समर्थन। अभी भी मौक़ा है हिंदी भाषी अन्य भारतीय भाषा सीखें। किसी शोध की ज़रूरत नहीं भारतेंदु जी का कथन है ही निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति को मूल।
Tuesday, February 10, 2015
Subscribe to:
Posts (Atom)