बैंक ऋण शोधन और नया अध्यादेश
भारत सरकार की तरफ़ से पिछले कुछ समय से संकेत आ रहे थे कि सरकार बैंकों में बढ़ते डूबन्त ऋण खातों के सम्बन्ध में कोई सख़्त क़ानून ले आएगी। गत 4 मई को राष्ट्रपति ने डूबते हुए क़र्ज़ों के शोधन के मसले पर दी बैंकिंग रेगुलेशन (अमेंडमेंट) ऑर्डिनेन्स, 2017 पर हस्ताक्षर कर जारी किया। इस अध्यादेश को तत्काल गज़ट में प्रकाशित भी कर दिया गया। इस अध्यादेश को इन्सॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी कोड 2016 की पृष्ठभूमि में जारी किया हुआ बताया गया है। इस अध्यादेश के द्वारा बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट 1949 की धारा 35ए के पश्चात् दो नई धाराएँ 35एए और 35एबी जोड़ी गई हैं। धारा 35एए के अनुसार केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक को आदेश जारी कर अधिकृत कर सकता है कि वो इन्सॉल्वेंसी एंड बैंक्रप्सी कोड, 2016 के अनुसार बैंकिंग कम्पनियों को इस आशय का निर्देश जारी करे जिससे कि ऋण अदा न होने की परिस्थिति में बैंक उन कम्पनियों के मामले में दिवाला शोधन की कार्रवाई शुरू कर सके। दूसरी नई धारा 35एबी के अनुसार रिजर्व बैंक फँसे हुए ऋण खातों के शोधन के लिए समय समय पर निर्देश जारी कर सकता है। इस प्रावधान के अन्तर्गत रिजर्व बैंक डूब रहे बैंक ऋणों के शोधन पर सलाह देने के उद्देश्य से अपने द्वारा अनुमोदित सदस्यों से बनी एक या अधिक प्राधिकारी या समिति की नियुक्ति कर सकता है।
इस अध्यादेश के बाद से बैंकिंग और बैंकिंग सर्किल से बाहर से तत्काल प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गईं। सबसे ज़्यादा प्रतिक्रिया नई धारा 35एबी को लेकर आ रही हैं। कई लोगों ने इसका यह कहकर स्वागत किया कि डूबते ऋण शोधन पर सलाहकार प्राधिकारी या समिति की नियुक्ति के कारण बैंक प्रबंधन में व्याप्त डर दूर होगा। सामूहिक निर्णय ऋण शोधन सम्बंधी नियमों के क्रियान्वयन में तेजी लाएगा। देखने में बात सही भी लगती है। लेकिन बैंकों की आज की कार्यप्रणाली को देखें तो पिछली सरकार के समय इसी प्रकार एक निर्णय लिया गया था कि क्योंकि बैंक एक्ज़ीक्यूटिव जब व्यक्तिगत निर्णय लेता है तो कई कारकों से प्रभावित हो सकता है या सही निर्णय नहीं कर सकता है। ऋण के मामले में लिया गया व्यक्तिगत निर्णय ख़राब ऋण का कारण हो सकता है। अत: बड़ी राशि के ऋण की संस्वीकृति किसी व्यक्ति विशेष के बजाए एक समिति द्वारा दिया जाना चाहिए। आशा की गई कि इस व्यवस्था के कारण ऋण संस्वीकृति के समय निष्पक्ष विचार करके अच्छी गुणवत्ता का ऋण जारी किया जा सकेगा। यह व्यवस्था लगभग सात साल से लागू है। लेकिन स्थिति में सुधार होने की जगह स्थिति बिगड़ी ही है। अत: यह आशा करना कि कई लोगों को मिलाकर बनी समिति सही निर्णय लेने में सक्षम होगी आशावाद की अति ही होगी। रही बात रिजर्व बैंक के ऋण शोधन में सीधे कूदने की तो किंगफ़िशर एयरलाइन्स का एक उदाहरण इतिहास में दर्ज है। नवम्बर 2010 में किंगफ़िशर का ऋण पुनर्गठन रिजर्व बैंक की देखरेख में ही हुआ था लेकिन यह पुनर्गठन लागू होने के तुरन्त बाद ही फ़ेल भी हो गया।
एक अन्य आपत्ति जो नई धार 35एबी के सम्बन्ध में उठाई गई है वह यह है कि रिजर्व बैंक रेगुलेटर है न कि क्रियाशील बैंक। रिजर्व बैंक बैंकों की कार्यप्रणाली पर तीखी नज़र रखता है। उसके सुपरविजन प्रक्रिया के कारण बैंकों की ग़लतियाँ लगातार पकड़ी जाती रही हैं, बैंकों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है और उन पर फाइन भी लगाया जाता रहा है। लेकिन इस नए आदेश की वजह से रिजर्व बैंक की बैंकों की कार्यप्रणाली में सीधी भागीदारी हो जाएगी तब रिजर्व बैंक के क्रियाकलापों को कौन जाँचेगा?
दरअसल देश में सख़्त से सख़्त क़ानून हैं डूबते ऋण से निजात पाने के लिए। एक क़ानून जिसे बैंकिंगक्षेत्र में सरफ़ेसी एक्ट के नाम से जाना जाता है, सन् 2002 में पिछली एनडीए सरकार ने ही लागू किया था। शुरुआत में बैंकों ने इस क़ानून की मदद से डूबते ऋणों की अच्छी वसूली भी की थी। बैंकर बहुत ख़ुश थे। बाद में धीरे धीरे कानूनविद् ऋण लेने वालों के पक्ष में कानून में लूपहोल निकालना शुरू किए और आज यह कानून लगभग निष्प्रभावी हो चुका है जैसे पहले के सभी प्रयास जिसमें डीआरटी आदि शामिल हैं निष्प्रभावी हो चुके हैं। सरकार के पास यह विकल्प है कि अपनी ही पिछली सरकार द्वारा लागू किए गए सरफ़ेसी एक्ट की समीक्षा कर कानून के छेदों को बन्द करे।
नए अध्यादेश की रोशनी में तत्काल रिजर्व बैंक ने सीडीआर प्रणाली को ऋणकर्ताओं के पक्ष में और लचीला बना दिया है। अब बैंक सीडीआर के निर्णय को मानने के लिए बाध्य हैं यहाँ तक कि बैंक का बोर्ड भी प्रासंगिक नहीं रह गया है। यह स्वस्थ परम्परा नहीं है। समस्या दरअसल बैंकों की कार्यप्रणाली में है। अगर बैंक एक्ज़िक्यूटिव्स सही निर्णय नहीं ले पा रहे हैं तो उसका निवारण होना चाहिए। बैंकिंग सेक्टर को डर से मुक्त कर स्वतंत्र बनाना चाहिए। समस्या का एक पहलू सरकार के हाथ में है विकास रुका हुआ है जिसके कारण परियोजनाएँ रुकी हुई हैं और कारपोरेट की आमदनी बंद है। इससे भी बडी समस्या है कारपोरेट की ऋण अदा करने की इच्छा शक्ति का न होना। बैंकों से सभी अपेक्षा रखते हैं कि उनकी रिस्क मैनेजमेंट मज़बूत होना चाहिए, उन्हें लगातार अर्थव्यवस्था पर नज़र रखनी चाहिए। लेकिन क्या यह कारपोरेट को भी नहीं करना चाहिए जिससे संकट के समय वो अपने व्यवसाय को संभाल कर बैंक का ऋण भी अदा करें और कुछ कमाई भी करें। बूम पीरियड में सभी बैंक से लाभ उठाते हैं बिना रिस्क का प्रबंधन किए और ख़राब समय में सब बैंकों पर मढ़ देते हैं। सबको मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना पडेगा। बैंक को अकेला छोड़ना अर्थव्यवस्था को संकट में डालना होगा।