फिल्म 'पीके'
मैं विधु विनोद चोपड़ा-राज कुमार हिरानी स्कूल ऑफ़ फिल्म मेकिंग को नापसंद करता हूँ। मेरा रिव्यू इसी नज़रिए से पढ़ा जाए अन्यथा जिन्हें यह शैली पसंद है मैं उनकी इज़्ज़त करता हूॅं।
राजकुमार हिरानी एबसर्ड शैली में फिल्म बनाते हैं। 'मुन्नाभाई एम बी बी एस', 'लगे रहो मुन्ना भाई', 'थ्री इडियट्स'और अब 'पीके' सभी इसी शैली में हैं। 'लगे रहो मुन्नाभाई' में यह सहने योग्य था। बाक़ी सभी फ़िल्मों में मुन्नाभाई या रैंचो या अन्य पात्र अपनी बात कहने के लिए बहुत कुछ दादा कोंडके शैली में अश्लील हरकतों और शब्दों का प्रयोग करते हैं। अपनी बात कहने के लिए किसी भी तरह से इसे सही नहीं ठहराया जा सकता है। एक उद्देश्य हो सकता है कि स्तर गिरा कर ज्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंच कर ज़्यादा कमाई की जाए। 'एम बी बी एस' और फिर 'थ्री इडियट्स' में प्रोफ़ेसर के साथ व्यवहार आपत्तिजनक था। 'थ्री इडियट्स' में पैंट उतारने के प्रकरण को इसमें भी जारी रखा गया। 'पीके' की फ़ण्डिंग को लेकर जो दिखाया गया वह निहायत आपत्तिजनक था जैसे भिखारी के कटोरे से पैसा उठाना, और फिर वो कहना क्या चाहते हैं। फ़ंडिंग के लिए हिलती कारों को बार बार दिखाना जुगुप्सा पैदा करता है। क्या कोई और आईडिया नहीं था इन बौद्धिक फ़िल्मकारों के पास। सेक्स के बारे में बात करना ठीक है। लेकिन इसे मज़ाक़ के रूप में दिखाना बताता है कि फ़िल्मकार इसे भी लेकर गम्भीर नहीं है। सेक्स फिल्म में बिना उद्देश्य के दिखाया गया है। यह इस फिल्म का विषय भी नहीं है। एक ग़नीमत है कि यहाँ 'चमत्कार-बलात्कार' जैसे अश्लील मज़ाक़ की जगह 'अच्छा' जैसे साफ़ सुथरे शब्द का प्रयोग किया गया है हालाँकि है यह बचकानी जिसे हम अपने बचकाने-किशोरावस्था में इस्तेमाल करते थे।
श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास राग दरबारी मैंने पहली बार लगभग तीस साल पहले पढ़ा था, बड़ा मज़ा आया था। लगभग डेढ़ साल पहले दोबारा पढ़ना शुरू किया। लेकिन आधा भी नहीं पूरा कर पाया और छोड़ दिया, बोरिंग लगा। एक पात्र कहानी में अलग अलग समय में तीन बार पेशाब करने जाता है जिसका कहानी से कोई संबंध नहीं है। इस फिल्म में भी हिलती कारों को बार बार दिखाना बताता है कि फ़िल्मकार के पास दिखाने के लिए आईडिया की कमी है।
'ओ माई गॉड' और इस फिल्म में बड़ी समानता है। दोनों ही फ़िल्में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की वकालत करती हैं। लेकिन अपनी बात कहने के लिए 'ओ माई गॉड' में अक्षय कुमार को भगवान कृष्ण के अवतार स्वरूप उपयोग में लाया जाता है। इस फिल्म में एलिएन आमिर खान को। इस फिल्म में अवतार ( इस अंग्रेज़ी फिल्म में बालों को जोड़कर ) की तरह हाथ पकड़ कर दूसरों से कनेक्ट करने का हथकण्डा अपनाया जाता है। यह कहाँ का विज्ञान है। बल्कि 'जागते रहो'में इसी लोक का भागता राजकपूर ज़्यादा प्रभावशाली ढंग से समाज की पोल खोलता जाता है।
भगवान की अवधारणा को ख़ारिज करने के लिए फिल्म में कहीं भी बहस नहीं होती है बस बेमतलब मज़ाक़ उड़ाया जाता है। एलिएन विभिन्न धर्मों को चिढ़ाकर बस भागता रहता है। इस ज़मीन के इंसान को नायक बनाया गया होता तो क्या अच्छा होता। आख़िर कबीर इसी जमीन के इंसान थे जिन्होंने आसमान के खुदा को ख़ूब ललकारा था।
मेरी नज़र में प्रेमचंद या तोलस्तोय ऐसे रचनाकार रहे हैं जिनके किसी दो रचनाओं के बीच कथ्य में समानता तलाशना कठिन है। फिल्म में ऐसा मैंने अभी तक बस संगीतकार जयदेव में पाया है कि आपको पूछना पड़ता है कि यह संगीत किस संगीतकार ने दिया है। 'लगे रहो' में क्लासमेक्स ज्योतिषी सौरभ शुक्ला को रेडियो टॉक से हराया जाता है इस फिल्म में धार्मिक गुरू सौरभ शुक्ला को टीवी और फ़ोन टॉक के ज़रिए हराया जाता है। जैसे 'एम बी बी एस' की हुबहू इंजीनियरिंग कॉपी 'थ्री इडियट्स' है उसी तरह 'पीके' 'लगे रहो मुन्नाभाई' का अगला एपिसोड है। बल्कि यह फिल्म यहाँ का ईंट वहाँ का रोड़ा है। यह 'लगे रहो मुन्नाभाई', 'थ्री इडियट्स', 'अवतार', 'ओ माई गॉड', 'कोई मिल गया' आदि का काढ़ा है। और तो और 'सत्यमेव जयते' भी अंत में जोड़ दिया गया। वास्तव में हिरानी के पास नया करने के लिए कुछ सूझ नहीं रहा है बस फिल्म बनाना है तो बना दिया। फिल्म में कई बार पुरानी फ़िल्मों के बिम्ब का भी उपयोग करते हैं क्योंकि उन्हें नया कुछ सूझ नहीं रहा है। शान्तनु मित्र के पास कोई नया संगीत नहीं है। एनर्जी भरने का नृत्य थ्री इडियट्स के 'जैसे फ़िल्मों में होता है' का रिपीटीशन है।
'एम बी बी एस' में वाट लगाने की बात मुख्य है, 'लगे रहो' में गेट वेल सून, 'थ्री इडियट्स' में आल इज वेल है तो इस फिल्म में यह 'रॉंग कनेक्शन' है। तकिया कलाम वही प्रयोग में लाते हैं जिनके पास आइडिया की कमी होती है या जो कन्फ्यूज्ड रहते हैं। ग़ौर की बात है कि इस फिल्म में कनफ्यूजन दूर करने की बात भी की गई है। फिल्म में प्रेम त्रिकोण दिखा कर क्या हासिल हुआ। यह फिल्म का विषय भी नहीं था। यह कन्फ्यूजन है।
प्रभाष जोशी ने बरसों पहले रविवारी 'जनसत्ता' में फिल्म और समकालीन सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियों के बीच सामंजस्य पर सुंदर लेख लिखा था। जैसे नेहरू युग में रूमानी अर्थशास्त्र की राजकपूर ने अपने रूमानी समाजशास्त्र के ज़रिए फ़िल्मों में व्याख्या करने की कोशिश की थी। (यह लेख किसी के पास हो तो ज़ाहिर करें)। आज का ज़माना फ्रैक्चर्ड सोच का जमाना है फिल्म में विचार टूटी-फूटी हालत में यहाँ वहाँ बस पड़े हैं। हिरानी जी नयी बात नए और श्लील ढंग से करें और नया शिल्प खोजें। अपने घिसे पिटे एबसर्ड फ़ार्मूले से हटें। इस बार काम आ गई, कुछ दिन बाद मार्केटिंग भी काम न आएगी। बाद में लोगों ने राजकपूर और देवानन्द की फ़िल्मों को देखना बंद कर दिया था।