Friday, April 28, 2017

Story of Nation Building Chip: अथ राष्ट्रनिर्माण चिप कथा

अथ राष्ट्रनिर्माण चिप कथा

राम ग़ुलाम हर रोज़ की तरह आज भी मेरे गेट के बाहर अपनी गद्दी बिछाकर जूता पॉलिश-रिपेयर का साज़ो-सामान क़रीने से जमा दिया। रोज़ अकेला आता है, और शाम को समेट कर अकेला ही चला जाता है। पॉलिश तो अब कौन कराता है, लेकिन छोटा-मोटा मरम्मत कराने दो-चार लोग जाते हैं। वह भी बहुत कम हो गया है। मॉल जो खुल गए हैं। जूता-चप्पल टूटा, फेंक दिया, दूसरा ख़रीद लिया। दिनभर गद्दी जमाकर बैठा राम ग़ुलाम भिखारी ज़्यादा कामगार कम लगता। मैंने कई बार उससे कहा कोई और काम पकड़ ले, इस धंधे में अब कुछ रहा नहीं। लेकिन कहता कोई और काम ढंग से आता ही नहीं।

आज गद्दी सजाकर सीधा उसने गेट की घंटी बजाई। मैं आलस में उठा। उसने बोला "साहब कल रात वो सुथन्नवा आया था, वही जो अपने को पी॰ सुथन्ना आलम कहता है। कह रहा था कि सरकार राष्ट्रनिर्माण की चिप बाँट रही थी। चिप लगा के काम करो अच्छी कमाई होती है। साहब साठ साल से चिपवा बँट रहा था लेकिन सब का सब पेट्रोल पम्पवे वाला हथिया लेता था। सरकार छापा मार के सब का सब जब्त कर लिया है। बताए रहा था सबको बँटेगा, गरीबन में। एक ठो हमहूँ को दिलवा दो। पहिले भी एक ठो चिप बँट रहा था लेकिन हम नाहीं ले पाए काहे से कि हमरे पास कौनो मोबाइल नाहीं रहल। वाला जरूर दिलवा दो।"

मैं उसकी ओर आँख फाड़ के देख रहा था। उसके हौसले पर वज्रपात करते हुए मैंने कहा, "तुम्हें नहीं मिलेगा" 

"क्यों साहब?", उसने पूछा। 

मैंने कहा वह चिप उसे ही मिलता है जिसके पास कम से कम एक स्कूटर या मोटर साइकिल हो। तुम्हारे पास तो मोपेड भी नहीं है।

बड़े उदास मन से सीधा भोजपुरी में कहने लगा, "साहब हम तऽ राम कऽ गुलामी करिला, कुल हमरे पास कहवाँ से आई। ठीक बा। जाए दऽ। हमार जिन्दगी एही से चली।" कह कर उसने अपनी गद्दी की तरफ़ इशारा किया। 

मुड़कर गद्दी पर बैठने को चला ही था कि एकाएक उसके चेहरे पर चमक गई। तेज़ी से पलटा और बड़े उत्साह से कहा, "देखऽ साहब, साठ साल से चिपवा सब बँटत रहल। कौनो सरकार के चिन्ता फिकिर रहल गरीबन कऽ? नाहीं! सरकार आइल एक्कै झटका में अमीरन के औकात बताय देहलस। नोटबंदियो पहिलिए बार भयल रहल नऽ। रहल केहू में दम? अमीरन कऽ अब नाहीं चली। मिले हमके चिप तऽ का! सब अमीर लोग बरबाद हो जाई"

मैं आँख फाड़कर सहमति में सर हिलाता रह गया।