Tuesday, December 13, 2016

डिजिटल भुगतान की समस्याएँ

(यह लेख दिनांक 14/12/2016 के प्रभात ख़बर में प्रकाशित हुआ है)
http://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/908903.html

बड़े नोटों के विमुद्रीकरण के पश्चात और नए नोटों की आपूर्ति में आ रही समस्याओं के कारण डिजिटल भुगतान में एकाएक बढ़ोत्तरी हुई है। डिजिटल भुगतान को क़ानूनी जामा पहनाने तथा इसे सुगम और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से संसद द्वारा पेमेंट एंड सेटलमेंट एक्ट 2007 पारित किया गया है। इस अधिनियम में प्रदत्त अधिकारों के तहत भारतीय रिज़र्व बैंक समय समय पर बैंकों और अन्य रेगुलेटेड एंटिटीज़ के लिए दिशानिर्देश ज़ारी करता है। हाल की घटनाओं के कारण रिज़र्व बैंक ने कई फ़ौरी निर्देश बैंकों और अन्य रेगुलेटेड संस्थाओं के लिए ज़ारी किया है।

रिज़र्व बैंक द्वारा हाल में जारी किए गए दिशानिर्देश मुख्यत: ई-वैलेट द्वारा रिटेल डिजिटल भुगतान के सिलसिले में हैं। इनमें शामिल हैं प्री-पेड इन्स्ट्रुमेंट के जारी करने तथा परिचालन, प्री-पेड इन्स्ट्रुमेंट जारी करने वाली संस्थाओं का तकनीकी ऑडिट, मोबाइल बैंकिंग लेनदेन, दो हज़ार रुपए तक के छोटे लेनदेन के मामलों में एडिशनल फ़ैक्टर ऑथेन्टिकेशन में रियायत आदि सम्बन्धी दिशानिर्देश। ये सारे दिशानिर्देश भारतीय रिज़र्व बैंक की वेबसाइट पर सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध हैं। इन दिशानिर्देशों के अलावा केवाईसी, एंटीमनी लॉन्डरिंग, आतंकियों के वित्तपोषण पर रोक, फाइनेन्शियल इन्टेलिजेंस यूनिट के संदेहास्पद लेनदेन के रिपोर्टिंग सम्बंधी दिशानिर्देशों का अनुपालन भी करना आवश्यक है। रिटेल और थोक भुगतान के लिए आरटीजीएस, एनईएफ़टी तथा इंटरनेट बैंकिंग सम्बन्धी दिशा निर्देश पहले से ही हैं।

हाल के वर्षों में भुगतान के लिए ई-वैलेट का इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण उपाय के रूप में उभर कर सामने आया है। ई-वैलेट के लिए कोई अलग से दिशानिर्देश नहीं हैं। विभिन्न कम्पनियों द्वारा ज़ारी ई-वैलेट प्रीपेड इंस्ट्रूमेंट सम्बन्धी दिशानिर्देशों द्वारा परिचालित होते हैं। बैंकों द्वारा जारी किए गए ई-वैलेट ख़ातों में जमा राशि को बैंक की देनदारी मानते हुए बैंकों से इस राशि पर आवश्यक सांविधिक रिज़र्व प्राप्त किया जाता है। लेकिन बैंकों के इतर संस्थाओं या व्यक्तियों के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं हैं। बैंकों द्वारा परिचालित ई-वैलेट के लिए एक संस्थागत शिकायत व्यवस्था है किन्तु अन्य संस्थाओं के लिए ऐसी कोई संस्थागत शिकायत व्यवस्था नहीं है। यह उन संस्थानों के ऊपर ही छोड़ दिया गया है जबकि बैंकों के मामलों में शिकायतकर्ता बैंकिंग ओम्बड्समैन तक भी जा सकता है। रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुसार वैलेट में जमा राशि का भुगतान सम्बन्धित प्राप्तकर्ता या मर्चेंट को अधिकतम लेनदेन के दिन से तीन दिनों में कर देना चाहिए। लेकिन इसपर सांस्थानिक नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसा हो सकता है कि कुछ ई-वैलेट कम्पनियाँ जानबूझकर भुगतान में देरी करें और जमा राशि पर ब्याज़ कमाएँ क्योंकि रिज़र्व बैंक के निर्देशों के अनुसार ये कम्पनियाँ न्यूनतम जमा कोर राशि पर ब्याज़ कमा सकती हैं। ई-वैलेट में आगत राशि को रोक कर कोर जमा राशि को बढ़ाया जा सकता है। ई-वैलेट के परिचालन और उनपर नज़र रखने की ज़िम्मेवारी उन बैंकों पर डाली गई है जहाँ सम्बन्धित एस्क्रो खाते खोले गए हैं जो कि उचित नहीं प्रतीत होता। ये दिशा निर्देश स्वचालित परिचालन को ध्यान में रख कर भी तैयार नहीं किए गए लगते हैं। दरअसल ई-वैलेट के लिए प्री-पेड इंस्ट्रुमेंट से अलग दिशानिर्देश होने चाहिए।

डिजिटल भुगतान में पूरी दुनिया में हो रही बढ़ोत्तरी के कारण जोखिम प्रबंध पर विशेष ध्यान रखा जा रहा है। लगातार नए रेगुलेशन अस्तित्व में आ रहे हैं जिनके लिए तकनीकी उपायों का विकास किया जा रहा है। वित्त-टेक्नॉलॉजी कम्पनियाँ हर नए रेगुलेशन के लिए अपने उपाय पेश कर रही हैं। लेकिन समय की माँग के अनुसार एक समग्र तकनीकी उपाय की तत्काल आवश्यकता है जिससे सभी रेगुलेशन के अनुपालन के लिए एक समेकित सॉल्यूशन हो।

डिजिटल भुगतान के एक अन्य लेकिन महत्वपूर्ण पक्ष पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया है और वह है कॉरपोरेट द्वारा किए जा रहे भुगतानों को लेकर। केपजेमिनी द्वारा ज़ारी वर्ल्ड पेमेंट रिपोर्ट 2016 के अनुसार रिटेल बैंकिंग ग्राहक मोबाइल द्वारा भुगतान में कॉरपोरेट से बहुत आगे हैं। कॉरपोरेट मोबाइल का इस्तेमाल सिर्फ़ भुगतान की मंज़ूरी देने, भुगतान सम्बन्धी एलर्ट प्राप्त करने तथा भुगतान एवं कॉरपोरेट पर्फ़ॉरमेंस पर नज़र रखने के लिए करते हैं। कारपोरेट द्वारा मोबाइल से भुगतान में जो अड़चनें बताई गई हैं वे हैं मोबाइल सॉल्यूशन का कम्पनी के कोर सॉफ़्टवेयर-ईआरपी, ट्रेड फ़ाइनेन्स और एकाउंटिंग तन्त्र से समन्वित न होना, सुरक्षा सम्बन्धी समस्याएँ, कार्यपालकों द्वारा मोबाइल सॉल्यूशन का उपयोग न कर पाना, मोबाइल स्क्रीन का छोटा होना आदि। लेकिन ये समस्याएँ तकनीकी हैं जिन्हें वित्त टेक्नॉलॉजी कम्पनियाँ सम्बन्धित कारपोरेट के साथ मिलकर दूर कर सकती हैं जिससे कॉरपोरेट द्वारा मोबाइल के माध्यम से भुगतान सुगम हो सके। रिटेल भुगतान और तेज़ी से बढ़ेगा जब कॉरपोरेट भी अपने भुगतान मोबाइल से करने लगें।

डिजिटल भुगतान टेक्नॉलॉजी आधारित भुगतान व्यवस्था है जिसमें लगातार नए उपायों की खोज होते रहना चाहिए। दुनिया के कई देशों ने नई कम्पनियों को भुगतान व्यवस्था में नए उपाय तलाशने के लिए सुरक्षित संस्थागत व्यवस्था की है जिससे ग्राहक और स्वयम् रिसर्च करने वाली कम्पनी को नुक़सान न हो। भारत में इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है और अगर कोई स्टार्ट-अप किसी आइडिया का प्रयोगत्मक परीक्षण करना चाहे तो भी उसे प्री-पेड इंस्ट्रुमेंट ज़ारी करने का लाइसेंस प्राप्त करना ही पड़े गा जो कि बहुत कठिन है।

नई टेक्नॉलॉजी को अपनाने में देश की आम जनता कभी पीछे नहीं रही है। उदाहरण के तौर पर साठ के दशक में अधिक उपज देने वाली फ़सलों की खेती है जिसके कारण देश खाद्यान्न उत्पादन में मज़बूत हुआ। इसे कम शिक्षित कहे जाने वाले किसानों ने अपनाया। आज के ज़माने में भी मोबाइल क्रांति का सर्वाधिक श्रेय देश की अशिक्षित और कम शिक्षित कही जाने वाली जनता को दिया जाना चाहिए जो अंग्रेज़ी वर्णमाला के की-बोर्ड का इस्तेमाल भी कर सकती है। समस्या सिर्फ़ जनता को प्रभावी और सुरक्षित उपाय उपलब्ध कराने में है। 

Saturday, September 24, 2016

नया जमाना: युद्ध का मतलब है राजनीतिक पराभव !

नया जमाना: युद्ध का मतलब है राजनीतिक पराभव !



आप का यह लेख सबसे सटीक विश्लेषण है युद्ध का। आज की सारी समस्याएँ, इमर्जेंसी व्यवहार, 1971 के युद्ध की देन है। महाभारत में क्या कृष्ण जीते ? उनकी हत्या हुई। पांडवों का क्या हुआ ?

Tuesday, September 20, 2016

ग्रीनहाउस गैस, खेती व पशुपालन



नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुटज़ेन ने कहा है कि औद्योगिक क्रांति की शुरुआत से लेकर नई शताब्दी के शुरू होने तक मानव के क्रियाकलापों से वातावरण में मिथेन की राशि दोगुनी हो गई है और कार्बन डाई ऑक्साईड (काडाऑ) की मात्रा तीस प्रतिशत बढ़ गई है जो कि पिछले चार लाख सालों में नहीं देखा गया। मानव ने अपने क्रियाकलापों से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों (ग्रीहागै), जिसमें मुख्य हैं काडाऑ, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइड (नाऑ) और क्लोरोफ़्लोरोकार्बन, को ख़ूब झोंका है जिसकी वजह से कहा जाता है कि ग्लोबल वॉर्मिंग हो रही है।ग्रीहागै हमारे औद्योगिक क्रियाकलापों से तो पैदा होते ही हैं लेकिन आम धारणा के विपरीत खेती और पशुपालन भी इनके उत्सर्जन में पीछे नहीं हैं। दोहराव से बचने के लिए इस लेख में उत्सर्जन की मात्रा 'करोड़ टन काडाऑ समतुल्य ग्रीहागै' में दिया गया है।

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेटिक चेंज द्वारा ज़ारी 2010 के आँकड़ों के अनुसार विश्व स्तर पर ग्रीहागै के कुल उत्सर्जन का 76 प्रतिशत हिस्सा काडाऑ, 16 प्रतिशत मिथेन, 6 प्रतिशत नाऑ तथा 2 प्रतिशत फ़्लोरिनेटेड गैस हैं। छिहत्तर प्रतिशत काडाऑ में से 65 प्रतिशत खनिज तेलों के जलने और औद्योगिक क्रिया कलापों से तथा ग्यारह प्रतिशत वानिकी और खेती से आता है जबकि मिथेन और नाऑ का बड़ा हिस्सा खेती से आता है। मिथेन काडाऑ के मुक़ाबले 21 गुना और नाऑ 310 गुना ज़्यादा प्रभावकारी है ग्लोबल वार्मिंग की प्रक्रिया में। मिथेन के प्रमुख स्रोत हैं दलदली ज़मीनें, कार्बनिक चीज़ों का सड़ना-गलना, दीमक, नेचुरल गैस, जैविक वस्तुओं का जलना, धान की खेती, जुगाली करने वाले जानवर तथा कूड़े के ढेर आदि। जुगाली करने वाले पशु पाचनतंत्र के ऊपरी भाग रुमेन में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में चारे को पचाने की प्रक्रिया में मिथेन का उत्पादन (एंटेरिक उत्सर्जन) करते हैं। इसी प्रकार धान की खेती, खाद भंडारण, खेतों और चारागाहों में पशुओं के मल के सड़ने आदि से भी मिथेन बड़ी मात्रा में पैदा होता है। अगर विश्व स्तर के आँकड़ों को देखें तो वर्ष 2010 में कुल उत्सर्जन में से 24 प्रतिशत योगदान खेती संबंधित गतिविधियों ने किया।

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा मई 2010 में 2007 के आँकड़ों के साथ इंडियन नेटवर्क फ़ॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट प्रकाशित किया गया था। उसके अनुसार देश में खेती 33.44 करोड़ टन ग्रीहागै उत्सर्जन के साथ 17.6 प्रतिशत उत्सर्जन में योगदान कर रहा था। सबसे महत्वपूर्ण आँकड़ा यह है कि सभी प्रकार के पशुओं का एंटेरिक उत्सर्जन 21.21 करोड़ टन तथा धान की खेती से उत्सर्जन 6.98 करोड़ टन, खेती से होने वाले कुल उत्सर्जन का क्रमश: 63.4 तथा 20.9 प्रतिशत था।

फ़ूड एंड एग्रिकल्चर ऑर्गनाइज़ेशन (एफ़एओ) के आँकड़ों के अनुसार 2011 में भारत के गोरू वर्ग के जुगाली करने वाले मवेशियों द्वारा 5.46 करोड़ मैट्रिक टन ग्रीहागै का एंटेरिक उत्सर्जन हुआ जो कि विश्व स्तर पर हुए इस प्रकार के उत्सर्जन का चौदह प्रतिशत था। ऐसा अनुमान है कि भारत में यह उत्सर्जन 2050 में बढ़ कर 8.16 करोड़ मैट्रिक टन हो जाएगा और विश्व स्तर पर अनुमानित ऐसे उत्सर्जन का 17.94 प्रतिशत हो जाएगा। सबसे गम्भीर बात यह है कि मवेशियों द्वारा खेतों या चारागाहों में किए गए मल के सड़ने से वर्ष 2011 में 7.06 करोड़ मैट्रिक टन ग्रीहागै का उत्सर्जन हुआ जो कि वर्ष 2050 में बढ़ कर 9.56 करोड़ मैट्रिक टन हो जाने का अनुमान है। अगर सभी प्रकार के जुगाली करने वाले मवेशियों को लें तो वर्ष 2011 में कुल 30.43 करोड़ मैट्रिक टन ग्रीहागै का एंटेरिक उत्सर्जन हुआ जो कि वर्ष 2050 तक बढ़ कर 34.29 करोड़ मैट्रिक टन हो जाने का अनुमान है। अगर देश के खेती सेक्टर को लें तो वर्ष 2011 में कुल उत्सर्जन 66.07 करोड़ मैट्रिक टन का हुआ और 2050 तक इसे बढ़कर 78.11 करोड़ मैट्रिक टन होने का अनुमान है। विश्व स्तर पर उत्सर्जन के मुक़ाबले यह वर्ष 2011 में 12.38 प्रतिशत था जो 2050 तक मामूली गिरावट के साथ 12.24 प्रतिशत पर बना रह सकता है। पशुपालन के बाद धान की खेती एक दूसरा बड़ा स्रोत है ग्रीहागै के उत्सर्जन का। भारत में 2011 में  धान की खेती से ग्रीहागै का उत्सर्जन 9.74 करोड़ मैट्रिक टन था। यह विश्व स्तर पर हुए उत्सर्जन का 18.66 प्रतिशत था।

ये आँकडें यह भ्रम दूर के लिए काफ़ी हैं कि खेती और पशुपालन पर्यावरण-मित्र गतिविधियाँ हैं। यह बात स्थापित है कि हमारा कृषि उत्पादन तंत्र बहुत ही अकुशल है। खेती ज़्यादा संसाधन और ऊर्जा खाती है लेकिन उसके मुक़ाबले उसकी उत्पादकता और उत्पादन बहुत कम है। जल और ज़मीन के उचित प्रबंधन का अभाव भी ग्रीहागै के उत्सर्जन में अपना भरपूर योगदान करता है। यही हाल पशुपालन के मामले में है। हर प्रकार के पशु-आधारित उत्पादन में हमारी उत्पादकता और उत्पादन बहुत कम है अत: ऊर्जा का ज़बरदस्त ह्रास होता है। एफ़एओ के ही आँकड़ों के अनुसार गोरू और भैंस वर्ग के पशुओं की प्रति हेक्टेयर जनसंख्या वर्ष 2011 में भारत में जहाँ 1.80 थी, विश्व स्तर पर यही आँकड़ा 0.32 था। स्पष्ट है कि पशुओं के मामले में हमारे पास उत्पादकता आधारित जनसंख्या संवर्धन और नियंत्रण नीति का सर्वथा अभाव है। मवेशियों से उत्सर्जित होने वाले ग्रीहागै का लगभग 39 प्रतिशत जुगाली करने से तथा 10 प्रतिशत खाद सड़ने से आता है।एफ़एओ के अनुसार पशुपालन को वैज्ञानिक ढंग से संचालित कर तथा बायोगैस आदि का उपयोग करके, कम्पोस्टिंग अपनाकर मवेशियों से होने वाले उत्सर्जन में तीस प्रतिशत की कमी लाई जा सकती है।

खेती और पशुपालन की उत्पादकता बढ़ने से जहाँ इन क्षेत्रों द्वारा ग्रीहागै के उत्सर्जन में कमी आएगी वहीं किसान भी समृद्ध बनेगा। खेती और पशुपालन में ग्रीहागै के उत्सर्जन का प्रबंध और उस पर नियंत्रण ही अंतत: किसानों की ख़ुशहाली की ओर ले जाएगा और यह रास्ता विज्ञान से होकर जाता है।

Sunday, September 18, 2016

नया जमाना: कम्प्यूटर युग में हिन्दी

नया जमाना: कम्प्यूटर युग में हिन्दी



सर यह मेरा पसंदीदा विषय है। मैं इस पर स्वयं एक लेख लिखकर आप द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर अपनी बात रखूँगा। बहुत ही सुंदर लेख।