Tuesday, September 20, 2016

ग्रीनहाउस गैस, खेती व पशुपालन



नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुटज़ेन ने कहा है कि औद्योगिक क्रांति की शुरुआत से लेकर नई शताब्दी के शुरू होने तक मानव के क्रियाकलापों से वातावरण में मिथेन की राशि दोगुनी हो गई है और कार्बन डाई ऑक्साईड (काडाऑ) की मात्रा तीस प्रतिशत बढ़ गई है जो कि पिछले चार लाख सालों में नहीं देखा गया। मानव ने अपने क्रियाकलापों से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों (ग्रीहागै), जिसमें मुख्य हैं काडाऑ, मिथेन, नाइट्रस ऑक्साइड (नाऑ) और क्लोरोफ़्लोरोकार्बन, को ख़ूब झोंका है जिसकी वजह से कहा जाता है कि ग्लोबल वॉर्मिंग हो रही है।ग्रीहागै हमारे औद्योगिक क्रियाकलापों से तो पैदा होते ही हैं लेकिन आम धारणा के विपरीत खेती और पशुपालन भी इनके उत्सर्जन में पीछे नहीं हैं। दोहराव से बचने के लिए इस लेख में उत्सर्जन की मात्रा 'करोड़ टन काडाऑ समतुल्य ग्रीहागै' में दिया गया है।

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेटिक चेंज द्वारा ज़ारी 2010 के आँकड़ों के अनुसार विश्व स्तर पर ग्रीहागै के कुल उत्सर्जन का 76 प्रतिशत हिस्सा काडाऑ, 16 प्रतिशत मिथेन, 6 प्रतिशत नाऑ तथा 2 प्रतिशत फ़्लोरिनेटेड गैस हैं। छिहत्तर प्रतिशत काडाऑ में से 65 प्रतिशत खनिज तेलों के जलने और औद्योगिक क्रिया कलापों से तथा ग्यारह प्रतिशत वानिकी और खेती से आता है जबकि मिथेन और नाऑ का बड़ा हिस्सा खेती से आता है। मिथेन काडाऑ के मुक़ाबले 21 गुना और नाऑ 310 गुना ज़्यादा प्रभावकारी है ग्लोबल वार्मिंग की प्रक्रिया में। मिथेन के प्रमुख स्रोत हैं दलदली ज़मीनें, कार्बनिक चीज़ों का सड़ना-गलना, दीमक, नेचुरल गैस, जैविक वस्तुओं का जलना, धान की खेती, जुगाली करने वाले जानवर तथा कूड़े के ढेर आदि। जुगाली करने वाले पशु पाचनतंत्र के ऊपरी भाग रुमेन में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में चारे को पचाने की प्रक्रिया में मिथेन का उत्पादन (एंटेरिक उत्सर्जन) करते हैं। इसी प्रकार धान की खेती, खाद भंडारण, खेतों और चारागाहों में पशुओं के मल के सड़ने आदि से भी मिथेन बड़ी मात्रा में पैदा होता है। अगर विश्व स्तर के आँकड़ों को देखें तो वर्ष 2010 में कुल उत्सर्जन में से 24 प्रतिशत योगदान खेती संबंधित गतिविधियों ने किया।

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा मई 2010 में 2007 के आँकड़ों के साथ इंडियन नेटवर्क फ़ॉर क्लाइमेट चेंज असेसमेंट प्रकाशित किया गया था। उसके अनुसार देश में खेती 33.44 करोड़ टन ग्रीहागै उत्सर्जन के साथ 17.6 प्रतिशत उत्सर्जन में योगदान कर रहा था। सबसे महत्वपूर्ण आँकड़ा यह है कि सभी प्रकार के पशुओं का एंटेरिक उत्सर्जन 21.21 करोड़ टन तथा धान की खेती से उत्सर्जन 6.98 करोड़ टन, खेती से होने वाले कुल उत्सर्जन का क्रमश: 63.4 तथा 20.9 प्रतिशत था।

फ़ूड एंड एग्रिकल्चर ऑर्गनाइज़ेशन (एफ़एओ) के आँकड़ों के अनुसार 2011 में भारत के गोरू वर्ग के जुगाली करने वाले मवेशियों द्वारा 5.46 करोड़ मैट्रिक टन ग्रीहागै का एंटेरिक उत्सर्जन हुआ जो कि विश्व स्तर पर हुए इस प्रकार के उत्सर्जन का चौदह प्रतिशत था। ऐसा अनुमान है कि भारत में यह उत्सर्जन 2050 में बढ़ कर 8.16 करोड़ मैट्रिक टन हो जाएगा और विश्व स्तर पर अनुमानित ऐसे उत्सर्जन का 17.94 प्रतिशत हो जाएगा। सबसे गम्भीर बात यह है कि मवेशियों द्वारा खेतों या चारागाहों में किए गए मल के सड़ने से वर्ष 2011 में 7.06 करोड़ मैट्रिक टन ग्रीहागै का उत्सर्जन हुआ जो कि वर्ष 2050 में बढ़ कर 9.56 करोड़ मैट्रिक टन हो जाने का अनुमान है। अगर सभी प्रकार के जुगाली करने वाले मवेशियों को लें तो वर्ष 2011 में कुल 30.43 करोड़ मैट्रिक टन ग्रीहागै का एंटेरिक उत्सर्जन हुआ जो कि वर्ष 2050 तक बढ़ कर 34.29 करोड़ मैट्रिक टन हो जाने का अनुमान है। अगर देश के खेती सेक्टर को लें तो वर्ष 2011 में कुल उत्सर्जन 66.07 करोड़ मैट्रिक टन का हुआ और 2050 तक इसे बढ़कर 78.11 करोड़ मैट्रिक टन होने का अनुमान है। विश्व स्तर पर उत्सर्जन के मुक़ाबले यह वर्ष 2011 में 12.38 प्रतिशत था जो 2050 तक मामूली गिरावट के साथ 12.24 प्रतिशत पर बना रह सकता है। पशुपालन के बाद धान की खेती एक दूसरा बड़ा स्रोत है ग्रीहागै के उत्सर्जन का। भारत में 2011 में  धान की खेती से ग्रीहागै का उत्सर्जन 9.74 करोड़ मैट्रिक टन था। यह विश्व स्तर पर हुए उत्सर्जन का 18.66 प्रतिशत था।

ये आँकडें यह भ्रम दूर के लिए काफ़ी हैं कि खेती और पशुपालन पर्यावरण-मित्र गतिविधियाँ हैं। यह बात स्थापित है कि हमारा कृषि उत्पादन तंत्र बहुत ही अकुशल है। खेती ज़्यादा संसाधन और ऊर्जा खाती है लेकिन उसके मुक़ाबले उसकी उत्पादकता और उत्पादन बहुत कम है। जल और ज़मीन के उचित प्रबंधन का अभाव भी ग्रीहागै के उत्सर्जन में अपना भरपूर योगदान करता है। यही हाल पशुपालन के मामले में है। हर प्रकार के पशु-आधारित उत्पादन में हमारी उत्पादकता और उत्पादन बहुत कम है अत: ऊर्जा का ज़बरदस्त ह्रास होता है। एफ़एओ के ही आँकड़ों के अनुसार गोरू और भैंस वर्ग के पशुओं की प्रति हेक्टेयर जनसंख्या वर्ष 2011 में भारत में जहाँ 1.80 थी, विश्व स्तर पर यही आँकड़ा 0.32 था। स्पष्ट है कि पशुओं के मामले में हमारे पास उत्पादकता आधारित जनसंख्या संवर्धन और नियंत्रण नीति का सर्वथा अभाव है। मवेशियों से उत्सर्जित होने वाले ग्रीहागै का लगभग 39 प्रतिशत जुगाली करने से तथा 10 प्रतिशत खाद सड़ने से आता है।एफ़एओ के अनुसार पशुपालन को वैज्ञानिक ढंग से संचालित कर तथा बायोगैस आदि का उपयोग करके, कम्पोस्टिंग अपनाकर मवेशियों से होने वाले उत्सर्जन में तीस प्रतिशत की कमी लाई जा सकती है।

खेती और पशुपालन की उत्पादकता बढ़ने से जहाँ इन क्षेत्रों द्वारा ग्रीहागै के उत्सर्जन में कमी आएगी वहीं किसान भी समृद्ध बनेगा। खेती और पशुपालन में ग्रीहागै के उत्सर्जन का प्रबंध और उस पर नियंत्रण ही अंतत: किसानों की ख़ुशहाली की ओर ले जाएगा और यह रास्ता विज्ञान से होकर जाता है।

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