Wednesday, May 20, 2015

वंशवृक्ष : डॉ एस एल भैरप्पा द्वारा रचित महान कन्नड उपन्यास


वंशवृक्ष
(उपन्यास)
डॉ एस एल भैरप्पा
हिंदी अनुवाद : डॉ वी बी पुत्रन
संस्करण: 2015
प्रकाशक:
आर्य प्रकाशन मंडल
IX/221, सरस्वती भण्डार,
गांधी नगर
दिल्ली - 110 031
मूल्य: ₹390/-

एक पुराने उपन्यास की याद !
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बात 1974-75 की होगी। दिनांक 21/03/2015 को कुछ ऐसा हुआ कि मैं भूतकाल में कल्पना करने लग गया कि काश मुझे आज क्या होगा इसकी जानकारी होती तो मैं उस उपन्यास में उस दिन की तारीख़ किताबों में छुपा कर रखने वाले फूलों की तरह दर्ज कर रखता और अपने दिल की तरह उस तारीख़ को उपन्यास के रचयिता के सामने ज़ाहिर कर देता। उपन्यास का नाम है 'वंशवृक्ष' और उसके रचयिता हैं कन्नड़ के महान उपन्यासकार डॉ एस एल भैरप्पा। मंगलुरु में 21/03/2015 को उनको सम्मानित करने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था और मैं ठीक उनके बग़ल में मंच पर बैठा था। काशी हिंदू विश्व विद्यालय में तब लाइब्रेरी में बस ऐसे ही मेज़ पर पड़ा यह उपन्यास हाथ लग गया और एक बैठक में पढ़ गया। ग़ैर हिंदी भारतीय साहित्य से मेरा पहला साक्षात्कार था यह उपन्यास। तब से आज तक इस उपन्यास को नहीं भूल पाया। जब मालूम हुआ कि कार्यक्रम में मुझे भी बोलना पड़ेगा तो मैंने यह उपन्यास फिर पढ़ना शुरू किया। यद्यपि कि अभी पिछले महीने ही उनका एक अन्य उपन्यास 'मंद्र' समाप्त किया था, लेकिन मुझे लगा भैरप्पा जी पर बोलने का लिए 'वंशवृक्ष' पढ़ना ही उपयुक्त होगा। यह लेख उसी द्वितीय पाठ पर आधारित है लेकिन भावनाएँ चालीस साल पुरानी हैं। क्लासमेक्स पर पहुँचते पहुँचते तब भी रोया था, इस बार भी। 

इतिहास और साहित्य 
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डॉ राम मनोहर लोहिया ने अपनी पुस्तक इतिहास चक्र में लिखा है कि गौतम बुद्ध का परिचय उस युग की सर्वश्रेष्ठ नर्तकी से कराया गया और नर्तकी ने उनसे संघ में शामिल किए जाने का आग्रह किया था। डॉ लोहिया के ही शब्दों में 'क्या उनके मन में तनिक सा भी कम्पन हुआ था जब युग की सबसे सुसंस्कृत महिला ने संघ में प्रवेश पाने की अनुमति माँगी ? हमें कुछ नहीं मालूम, न जान पाना कभी सम्भव है, क्योंकि बुद्ध को छोड़ कर कोई अन्य यह नहीं जान पाया कि क्या हुआ था, और शायद बुद्ध भी न जान पाए होंगे कि क्या हुआ था। क्लियोपेट्रा को कैसा लगा होगा, जब उसके प्यार में सीज़र की जगह ऐन्टोनी ने ले ली ? ईसा की भी मैंडोलिन थी। इन लोगों की तब सचमुच क्या अनुभूतियाँ थीं, जिन्होंने न केवल अपने युग में बल्कि हमेशा के लिए, मनुष्यों के दिमाग़ पर इतना गहरा प्रभाव डाला, यह इतिहास में सदा ही छिपा रहेगा। ' 

 उपन्यास में पात्र प्रारंभ में विचार करते हैं, 'जो केवल भौतिक परिवर्तनों को पहचानता है वह इतिहासकार नहीं हो सकता। एक पीढ़ी के अंत:सत्व में होने वाले भीतरी परिवर्तनों को, उनके मूल्यों के बीच के संघर्ष को केवल इतिहास ही नहीं कला, साहित्य, तत्वज्ञान आदि माध्यमों से पहचाना जाता है। इस दृष्टि से साहित्य और इतिहास के बीच कोई विशेष अंतर नहीं है। मगर समस्त पीढ़ी को दृष्टि में रखकर इस अंत:सत्व परिवर्तन का वर्णन करना इतिहास है, तो कुछ व्यक्तियों के जीवन को केंद्र मानकर उसी अंत:सत्व परिवर्तन को व्यक्त करना साहित्य है। इस संधिकाल को चित्रित करने वाली रचनाएँ ही साहित्य की महान कृतियाँ बन जाती हैं। इन दोनों का संबंध जानकर ही रामायण-महाभारत को ऐतिहासिक ग्रंथ माना गया है।' यह उपन्यास यह भी स्पष्ट करता है कि 'इतिहास कोई स्पष्ट चिह्न दिखाकर अपने स्वरूप को नहीं बदलता' बल्कि 'पीढ़ी के मूलभूत मूल्यों में कोई स्पष्ट परिवर्तन होने पर ही नए युग को प्रारंभ होता है। तब इतिहास भी नया स्वरूप धारण करता है।' भैरप्पा का यह उपन्यास हमारे युग के इतिहास के अंत:सत्व परिवर्तन को पकड़ कर बहस करता है। 

युग संक्रमण
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यह उपन्यास आज के युग संक्रमण पर कुछ चरित्रों के माध्यम से विमर्श करता है और जैसा कि उच्च कोटि के रचनाओं में होता है यह बिना कोई नुस्ख़ा बताए सोचने को मजबूर करता है कि हमें अब युग परिवर्तन के लिए स्वयम् को तैयार करना पड़ेगा। मुख्य पात्र है श्रीनिवास श्रोत्रिय जो धर्मराज युधिष्ठिर की तरह हर हालत में धर्म के मार्ग पर ही चलते हैं, उनके साथ हैं उनकी पुत्रवधू कात्यायनी जो अपने प्रथम पति की मृत्यु के बाद राजाराव से विवाह करती है और हैं राजाराव के बड़े भाई डॉ सदाशिवराव जिन्होंने एक पत्नी नागलक्ष्मी के रहते हुए अपने बृहत् इतिहास लेखन को पूरा करने हेतु अपनी सिंहली छात्रा करुणरत्ने से दूसरा विवाह करते हैं। तीसरी पीढ़ी के रूप में डॉ सदाशिवराव का पुत्र पृथ्वी और कात्यायनी के पूर्व एवं दिवंगत पति से उत्पन्न पुत्र चीनी है जिन्हें अब बदलते परिवेश में अपना अस्तित्व और अपनी राह तलाशनी है, बिलकुल श्याम बेनेगल की फ़िल्मों की तरह, किंतु यहाँ वह पत्थर फेंकता नज़र नहीं आता है। तीसरी पीढ़ी अपने को संक्रमण काल में पाती है और इस ज़िम्मेदारी के साथ कि उन्हें अपना रास्ता ख़ुद तलाशना है। 

वर्तमान पीढ़ी संक्रमण काल में नए मूल्यों तथा नई परिस्थितियों के कारण उत्पन्न द्वंद्व में फँसा हुआ है और महसूस  करता है कि उसके दु:ख दूर करने की शक्ति किसी वेदांत में नहीं है। उपन्यास की प्रतिस्थापना ही यह है कि एक पीढ़ी के दु:ख को दूसरे की नज़र से आँकना असाध्य कार्य है। 

धर्म-अधर्म के पाटन बीच व्यक्ति
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पूरा उपन्यास धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप के बीच स्थित सूक्ष्म रेखा की विवेचना करता रहता है। श्रीनिवास श्रोत्रिय, जो सबसे बूढ़ी पीढ़ी है, धर्म परायण होते हुए और धर्म मार्ग से डिगे बिना भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के आड़े नहीं आता है। दूसरी पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी द्वारा स्थापित मान्यताओं को तोड़ कर अपने मन का जीवन जीने का साहस करते हैं लेकिन पुरानी मान्यताओं को तोड़ने का भी ख़ुद को दोषी मानते हुए एक द्वंद्व में जीते हैं और अंततः इस द्वंद्व के कारण मानसिक आघात के चलते मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यहीं उपन्यासकार तीसरी पीढ़ी के पृथ्वी और चीनी के रूप में हमें छोड़ देता है कि अब कोई नई राह तलाशनी पड़ेगी। ये विषय लगता है आज भी ज्वलंत हैं बल्कि यह कहना पड़ेगा कि आज ज़ादा नुकीला बन कर उभरा है। अब अगर इन समस्याओं को उपयुक्त तरीके से न संभाला गया तो मानव जीवन रूपी ग़ुब्बारे में यह छेद कर देगा। प्रेम जैसा विषय आज के समाज में घृणा की नज़र से देखा जा रहा है, सामाजिक और राजनैतिक दोनों स्तर पर। वंशवृक्ष उपन्यास आजके समाज और राजनीति में हो रहे उथल पुथल के इतिहास को मानव मन में उठ रहे विचारों/शंकाओं के माध्यम से दर्ज कर रहा है। इसका कोई मतलब नहीं कि यह उपन्यास काफ़ी पहले लिखा गया है। बल्कि आज प्रेम विवाह पर हो रहे बहसों और ऑनर किलिंग को देखते हुए मन सोचता है कि इसका क्लासमेक्स कहाँ है।

भौगोलिक पृष्ठभूमि 
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कहानी मुख्य रूप से दो स्थानों में केंद्रित है। पहला नंजनगूडु और दूसरा मैसूर। श्रीनिवास श्रोत्रिय नंजनगूडु में रह कर धर्म की व्याख्या करते हैं जब कि सारा वैचारिक द्वंद्व कर्नाटक राज्य के सांस्कृतिक और बौद्धिक राजधानी मैसूर में चलती है। नंजनगूडु वह क़स्बा है जहाँ परशुराम ने अपने पापों से मुक्ति के लिए शिव के निर्देश से श्रीनंजुंडेश्वर/श्रीकण्ठेश्वर नाम से शिव लिंग की स्थापना की है। नंजनगूडु को दक्षिण काशी भी कहते हैं। वह काशी जहाँ पाप और पुण्य की विवेचना होती है। काशी की तरह यहाँ भी एक मणिकर्णिका घाट है। और श्री नंजुंडेश्वर का अर्थ है समुद्र मंथन से निकले विष का पान करने वाला। पूरे उपन्यास को पढ़ने के बाद आप समझ सकेंगे कि यही दोनों जगहों को क्यों केंद्र बनाया गया है। 

भारतीय जीवन के रंग और भारत की मातृभाषाएँ
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मेरी नज़र में उपन्यास की एक और विशेषता है। किसी भी अन्य भारत-भाषी के मस्तिष्क में मौजूद द्वंद्व की तरह यहाँ भी अंग्रेज़ी और मातृभाषा की बातें हैं। श्रीनिवास श्रोत्रिय प्रकाण्ड विद्वान हैं लेकिन उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती।  इतिहासकार डॉ सदाशिवराव अपने महत्वाकांक्षी इतिहास लेखन के लिए श्रीनिवास श्रोत्रिय से दिशा निर्देश लेते हैं।  डॉ सदाशिवराव की नाटक प्रेमी पत्नी नागलक्ष्मी एक स्थान पर कहती है कि उसे अंग्रेज़ी नाटक इसलिए नहीं पसंद हैं क्योंकि उनमें नाच-गाने नहीं होते हैं, और फिर उसे भाषा भी समझ में नहीं आती। सचमुच भारतीय जीवन के रंगों को भारतीय (मातृ)भाषाओं के माध्यम से ही समझा जा सकता है। 

वंशवृक्ष 
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उपन्यास इस हाइपोथिसिस से प्रारंभ होता है कि 'मनुष्य गृहस्थ-धर्म के निमित्त शादी करता है। वह गृहस्थ बनता है, इस संसार के अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए। तत्पश्चात संतान होती है, वंशवृक्ष को क़ायम रखने के लिए। संतानहीन मनुष्य के अपने वंशवृक्ष रूपी परिवार का अंतिम मनुष्य बनकर केवल शून्य को छोड़कर मरना पड़ता है। पितृत्व से प्राप्त जीव पितृ-ऋण से मुक्त होता है, अपनी सन्तान द्वारा ही।' वहीं दूसरी पीढ़ी का मत है 'मानव-कल्पित समाज, रीति-रिवाज, नीति-नियम आदि जीवन की मूलभूत शक्ति को कुण्ठित कर देने वाली बीमारियाँ हैं।' इन बुराइयों से ऊपर उठाकर, जीवन की मूल चेतना का दर्शन कराना ही साहित्य का उद्देश्य है। इसी क्रम में यह उपन्यास विधवा मन और उसकी सामाजिक/धार्मिक स्थिति पर बहस शुरू करता है। स्त्री के लिए उपन्यास में प्रकृति को बिम्ब स्वरूप उपयोग करते हुए वर्तमान पीढ़ी के विचारों को यूँ रखा गया है, 'प्रकृति चिर यौवनावस्था है। उसके सुंदर स्वरूप को रौंदने का प्रयास करने वाला धर्म स्वयं मिट जाता है।' सबसे उल्लेखनीय बात है कि पूरे उपन्यास का शिल्प ऐसा है कि कहीं भी यह बहस-विवेचना प्रवचन में नहीं तब्दील होता है। बस घटनाएँ घटती जाती हैं और पाठक के मन में बहस चलती रहती है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए पाठक को अपने विवेक का इस्तेमाल करने की पूरी स्वतंत्रता दी गई है। 

संतानहीन मनुष्य के शून्य को अगर और सूक्ष्मता से समझना हो तो डॉ धर्मवीर भारती द्वारा रचित कहानी 'बंद गली का आख़िरी मकान' में मुंशी जी की कहानी भी इसी क्रम में अवश्य पढ़ें। यह कहानी वंशवृक्ष और वंशोद्धार के बहस को एक नए स्तर पर ले जाती है। मुंशी जी भी कहीं न कहीं इस उपन्यास के पात्रों की तरह द्वंद्व के जाल में फँसे हैं और उनकी मृत्यु भी लगभग कात्यायनी जैसी परिस्थितियों में होती है। 

वंशवृक्ष विषय पर बार बार अलग अलग परिस्थितियों में अलग अलग तरह से विचार प्रस्तुत किया गया है। श्रोत्रिय की ओर से बारंबार कहलाया गया है कि विवाह गृहस्थ-धर्म निभाने और वंशोद्धार के निमित्त ही होता है। वंशोद्धार के पश्चात् उसकी भूमिका सीमित ही है। मातृत्व, पितृत्व और भ्रातृत्व सभी वंश की पृष्ठभूमि में रहते हैं। वंश का उद्देश्य पूर्ण करने के लिेए ही स्त्री-पुरुष पति-पत्नी बनते हैं। इन्हीं तर्कों के आधार पर वह कहता है कि माता पुनः कुमारी कैसे बन सकती है तथा विकास पथ में एक बार प्राप्त स्तर का ही पुनः अनुभव करना पाप है। पुनर्विवाह अधर्म है। पुत्र अपने वंश से न सिर्फ़ देह और सम्पत्ति प्राप्त करता है बल्कि वह वंश का विश्वास, मत, संस्कार, धार्मिक ज़िम्मेदारियाँ भी प्राप्त करता है। श्रोत्रिय कहते हैं, 'कि हमें केवल शरीर चाहिए, संस्कारों से हमारा कोई संबंध नहीं - टेढ़ा तर्क है'। 

वंशोद्धार पर बहस की एक और धारा भी है उपन्यास में, वह है डॉ सदाशिवराव और करुणरत्ने द्वारा इतिहास ग्रंथों की रचना। करुणरत्ने की मातृत्व की लालसा पर अंत में ग्रंथ रचना की ही विजय होती है और ग्रंथ को ही संतति के रूप में मान्यता दी गई है। करुणरत्ने उन ग्रंथों के बारे में कहती भी है, 'वे उसके पिता हैं और मैं माँ हूँ-जीवन का अर्थ समस्त तृप्ति की परिपूर्णता ही नहीं है।' दरअसल उपन्यास में इस बहस को लगातार बनाए रखा गया है कि हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने एक विशिष्ट पथ द्वारा जीवन को सार्थक बनाए। 

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक-धार्मिक मानदण्ड 
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कात्यायनी नौजवान विधवा है। विधवा होने के उपरांत, अपने दिवंगत पति की अधूरी शिक्षा को ख़ुद पूरी करने का निश्चय कर मैसूर पढ़ने जाती है तो उसका बाहरी दुनिया से सम्पर्क होता है। राजाराव से मुलाक़ात के बाद ज़िंदगी के प्रति उसका नज़रिया बदलता है। लेकिन उसे स्पष्ट भी है कि उसकी राह स्त्री होने के नाते आसान भी नहीं है। वह कहती है, 'स्त्री को अनुभवों से वंचित करने के लिए हज़ारों बाधाएँ हैं। वे सब मानव निर्मित हैं। कई बार ये बाधाएँ स्त्री की मूल शक्ति का सामना करने में विफल होती हैं। तब पुरुष सैकड़ों भय मिश्रित रिवाज फैलाता है। हमारे कई स्वरूपों पर आरोप लगाकर, पुरुषों को हमसे वंचित करने का प्रयत्न चलता रहता है।' इन्हीं तर्कों पर वह कहती भी है कि पुरुष तो स्त्रियों से दुर्बल है ! लगभग पचास साल पहले लिखा गया उपन्यास क्या आज कहीं से पुराना लगता है। कात्यायनी अपने धर्म परायण ससुर से भी बहस करती है, 'इस समाज में अगर स्त्री के जीवन में कोई दुर्घटना घटी तो पुनः सुधारने की संभावना नहीं है। विधुर पुरुष दस बार विवाह कर ले तो कोई आपत्ति नहीं, स्त्री के अंत:करण को समझने की सहानुभूति का प्रारंभ से ही अभाव है।' यह त्रासदी है कि पाप का अवबोध कात्यायनी अपने मन से नहीं निकाल पाती है और द्वंद्व के कारण मृत्यु शैय्या पर पड़े पड़े मृत्यु को प्राप्त होती है। 

इसी तरह डॉ सदाशिवराव इतिहास लेखन के लिए जब एक पत्नी के रहते अपनी छात्रा से विवाह करते हैं ते साथ-साथ एक द्वंद्व भी मोल लेते हैं। अंत में दोनों पत्नियों के साथ रहने की राह जब निकलती दिखती है तो ख़ुशी के भावातिरेक के कारण मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। यहाँ भी द्विपत्नी व्यवस्था पर बहस खुला छोड़ दिया जाता है। 

उपन्यास में तीनों स्त्रियाँ, कात्यायनी, नागलक्ष्मी और करुणरत्ने, अपने जीवन के बारे में अकेले और स्वतंत्र निर्णय लेती हैं। कहीं स्पष्ट तौर पर नहीं लिखा गया है लेकिन लगता है पुरुष अपने को अलग ही रखे हुए है। एक जगह तो स्पष्ट तौर पर राजाराव कात्यायनी से क्रोध में कहता भी है, 'अगर इतना साहस नहीं था तो मेरे साथ इतनी दूर क्यों चली आईं'। उपन्यास में तीनों स्त्रियाँ अकेली रह जाती हैं। करुणरत्ने स्वदेश रवाना हो जाती है, नागलक्ष्मी जीवन भर पति के प्रेम की लालसा लिए रह जाती है और कात्यायनी अपने पुनर्विवाह को धर्म पथ से विचलन मानकर द्वंद्व में मृत्यु को प्राप्त होती है। 

मैंने ऊपर उल्लेख किया है कि श्रोत्रिय धर्म परायण होते हुए भी विश्वास करते हैं कि व्यक्ति पर बाह्य जगत द्वारा ज़बरदस्ती लादी जाने वाली रूढियाँ धर्म का पूर्ण रूप नहीं है। वह इस बात का हमेशा से समर्थन करता है कि हर व्यक्ति को अपनी बुद्धि के अनुसार निर्णय करने की स्वतंत्रता है। हालाँकि वह यह भी कहता है कि व्यक्तिगत निर्णय, संकल्प आदि हमारे अपने-अपने धर्म, ज़िम्मेदारी आदि के अनुसार होना चाहिए तथा व्यक्तिगत सुख के लिए संकुचित विचारों से ऊपर उठ कर देखने पर ही धर्माधर्म स्पष्ट गोचर होता है। उपन्यास के अंत में चीनी भी द्वंद्व में है। वह अपनी माँ द्वारा दुबारा शादी को पसंद नहीं करता है। लेकिन उनकी मृत्यु के उपरांत श्रोत्रिय से पूछता है कि जो मर गईं उसकी माँ थीं, उनका जीवन किस तरह चला और समाप्त हो गया, क्या वह उनकी उत्तर क्रिया करे? श्रोत्रिय पुनः स्पष्ट करते हैं कि दूसरों के पाप-पुण्य का निष्कर्ष निकालने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। इस तरह उपन्यास धर्म और व्यक्तिगत आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की बहस को अंत तक खुला रखता है। दरअसल पूरा उपन्यास धर्म और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच द्वंद्व को उभार कर हमें सोचने को मजबूर करता है और वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी का आह्वान करता है कि अब समय हो चुका है कि नया रास्ता तलाशा जाय। 

क्लाइमेक्स 
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श्रीनिवास श्रोत्रिय को अपने वंश पर अपार अभिमान है। वह मानते हैं कि यह वंश श्रोत्र इतना प्राचीन है जिसका मूल नहीं खोजा जा सकता है। उपन्यास में श्रोत्रिय के माध्यम से धर्म की व्याख्या कराई जाती है। उपन्यास अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर श्रोत्रिय को जड़ से हिला देता है। जब उसे दिलासा दिलाने की भी कोशिश की जाती है कि मनुष्य के कर्म के अनुसार भगवान पाप-पुण्य का फल देता है तो भी वह अपने द्वारा बनाए मानदंड से डिगता नहीं है। और सबकुछ हमारे (तीसरी पीढ़ी के) विवेक पर सौंप कर तमसो मा ज्योतिर्गमय का उच्चारण करते हुए सन्यास के लिए निकल पड़ता है। उपन्यास का क्लाइमेक्स किसी थ्रिलर की तरह है जो श्रोत्रिय के साथ-साथ पाठक के अंदर से झकझोर देता है और सोचने को मजबूर कर देता है। 

भाषा, शिल्प और विषय
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भैरप्पा के इस उपन्यास की भाषा, शिल्प और विषय की तुलना अगर की जा सकती है तो आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों से की जा सकती है। इस उपन्यास के लिए विशेष तौर पर 'पुनर्नवा' का नाम लिया जा सकता है। लगेगा ही नहीं कि किसी अन्य भाषा में लिखी गयी रचना पढ़ रहे हैं, इतना सुंदर अनुवाद है। 

आज के भारतीय समाज के मन और राजनीति में चल रहे उथल पुथल को समझने के लिए इस उपन्यास का पढ़ा जाना अति आवश्यक है। यह उपन्यास भारतीय मन को जोड़ने का भी काम करेगा। 

बिभाष कुमार श्रीवास्तव 

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