Saturday, May 14, 2011

kavita

पुण्य कोई
नुस्खा नहीं है
कलंक धोने का I
पाप तो भोगना ही पड़ेगा I
या फिर
पाप विरासत बनकर
पीढ़ियों को अभिशापित करेगा I

मैं पापों का वंशानुक्रम
तोडूंगा I
मेरे पिता !
मुझे बंटवारे में
संपत्ति नहीं
पुरखों के पाप देना I

मैं भी एक
भागीरथ-प्रयत्न करूंगा I
भोगूँगा उन पापों को !

2 comments:

  1. वाह।
    भावनाओं की एक नयी गंगा अवतरित करती है ये कविता।

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