पुण्य कोई
नुस्खा नहीं है
कलंक धोने का I
पाप तो भोगना ही पड़ेगा I
या फिर
पाप विरासत बनकर
पीढ़ियों को अभिशापित करेगा I
मैं पापों का वंशानुक्रम
तोडूंगा I
मेरे पिता !
मुझे बंटवारे में
संपत्ति नहीं
पुरखों के पाप देना I
मैं भी एक
भागीरथ-प्रयत्न करूंगा I
भोगूँगा उन पापों को !
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
वाह।
ReplyDeleteभावनाओं की एक नयी गंगा अवतरित करती है ये कविता।
धन्यवाद।
Delete